शनिवार, 27 सितंबर 2008

ईद-उल-फितर


भाइयो मिलकर मनाओ ईद
दिल में न रह जाए कसक और फिकर
गर गरीबी में दबा हो कोई बन्दा
बाँट फितरा दिखा उसको भी जिगर
पर न जिन्दा जनावर को मार
मुर्दा खा ना बन्दे कर परिंदे बेफिकर
दर और दरिया मान सबका
मौहब्बत का सब बराबर सब बराबर

ज़र और जोरू है सलामत
ख़ुद की व औरों की, रख पाक अपनी भी नज़र
सरहद हिंद पर मरने का ज़ज्बा पाल
कर दे दुश्मनों को नेस्तनाबूद और सिफर
----- तभी होगी ईद-उल-फितर।

2 टिप्‍पणियां:

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

वाह भाईजान! आप तो छा गए।

शैली ने कहा…

wah-wah